पोस्ट-रजिस्ट्रेशन विजिट में व्यापारी की अनुपस्थिति को बनाया आधार, धारा 29 के तहत रद्द किया गया पंजीकरण
ओडिशा हाईकोर्ट ने GST कानून के दायरे में एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प फैसले में यह स्पष्ट किया है कि केवल निरीक्षण के समय व्यापारी के न मिलने मात्र से GST रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं किया जा सकता। प्रकाश कुमार नायक बनाम कमिश्नर, सीटी एवं जीएसटी मामले में कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को जल्दबाजी और मनमानी करार देते हुए रद्द कर दिया।

मामले में सामने आया कि याचिकाकर्ता प्रकाश कुमार नायक के व्यवसाय स्थल पर विभागीय अधिकारियों ने पोस्ट-रजिस्ट्रेशन विजिट / सर्वे किया था। इस दौरान व्यापारी मौके पर उपस्थित नहीं मिले। बाद में यह तथ्य सामने आया कि व्यापारी उस समय गंभीर रूप से बीमार थे, जिस कारण वे व्यवसाय स्थल पर मौजूद नहीं हो सके। इसके बावजूद विभाग ने इस अनुपस्थिति को संदेह के रूप में लिया और यह मान लिया कि व्यवसाय वास्तव में अस्तित्व में नहीं है या रजिस्ट्रेशन गलत जानकारी के आधार पर प्राप्त किया गया है।
इसी आधार पर विभाग ने CGST/OGST अधिनियम की धारा 29(2) का सहारा लेते हुए यह निष्कर्ष निकाल लिया कि GST रजिस्ट्रेशन धोखाधड़ी, तथ्यों को छिपाकर या गलत विवरण देकर प्राप्त किया गया है। विभाग द्वारा पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और उसके बाद बिना किसी ठोस जांच या व्यापारी का पक्ष सुने, GST रजिस्ट्रेशन रद्द करने का आदेश पारित कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पोस्ट-रजिस्ट्रेशन विजिट के समय व्यापारी का बीमार होने के कारण अनुपस्थित रहना, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि व्यवसाय फर्जी है या रजिस्ट्रेशन गलत तरीके से लिया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अधिकारी को संदेह था, तो व्यापारी को समुचित अवसर देकर, दस्तावेज मांगकर और तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर निर्णय लिया जाना चाहिए था।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धारा 29(2) के तहत रजिस्ट्रेशन रद्द करने जैसी गंभीर कार्रवाई के लिए केवल अनुमान और संदेह पर्याप्त नहीं हैं। बिना ठोस कारण, स्पष्ट आरोप और उचित सुनवाई के पारित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने न केवल रजिस्ट्रेशन रद्द करने के आदेश को, बल्कि उससे जुड़े कारण बताओ नोटिस को भी निरस्त कर दिया।
यह फैसला उन हजारों व्यापारियों के लिए अहम माना जा रहा है, जिनके खिलाफ पोस्ट-रजिस्ट्रेशन सर्वे के नाम पर जल्दबाजी में कठोर कदम उठाए जाते हैं। हाईकोर्ट का यह निर्णय साफ संदेश देता है कि बीमारी या अस्थायी अनुपस्थिति को फर्जीवाड़े का प्रमाण नहीं माना जा सकता और कानून के तहत हर करदाता को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।