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CGST घूसकांड: छापों के बाद शुरू होता था असली खेल

उत्तर प्रदेश के झांसी से केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) विभाग में भ्रष्टाचार का एक गंभीर मामला सामने आया है। इस मामले ने कर प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। CBI की जांच में CGST की डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, जिन पर आरोप है कि वे विभागीय छापेमारी को व्यापारियों से अवैध वसूली का जरिया बनाती थीं।

छापेमारी के बाद बनता था दबाव का माहौल

CBI जांच में सामने आया है कि व्यापारियों के यहां जब CGST की छापेमारी की जाती थी, तो उसका उद्देश्य केवल दस्तावेजों की जांच नहीं होता था। छापे के दौरान भारी टैक्स, जुर्माने और गिरफ्तारी की आशंका दिखाकर व्यापारियों पर मानसिक दबाव बनाया जाता था। इसके बाद संकेत दिए जाते थे कि यदि वे मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं, तो “ऊपर तक बात” करनी होगी।

घर बुलाकर तय होते थे सौदे

जांच एजेंसी के अनुसार, छापेमारी के बाद डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी संबंधित व्यापारियों को सरकारी दफ्तर के बजाय अपने निजी आवास पर बुलाती थीं। यहीं पर यह तय किया जाता था कि कितनी कर देनदारी दिखाई जाएगी, कितनी पेनल्टी कम की जाएगी और किस कानूनी धारा में केस को निपटाया जाएगा। इन सभी फैसलों के बदले मोटी रकम की मांग की जाती थी।

डेढ़ करोड़ की रिश्वत की मांग का खुलासा

CBI के अनुसार, इस पूरे मामले में व्यापारियों से करीब डेढ़ करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। इसी सौदे की एक कड़ी के तहत CGST के दो सुपरिटेंडेंट अनिल कुमार तिवारी और अजय कुमार शर्मा को 70 लाख रुपये नकद रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया। इस ट्रैप के बाद पूरे नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हो गईं।

बिचौलियों और वकीलों की भूमिका भी उजागर

जांच में यह भी सामने आया है कि इस घूसकांड में केवल सरकारी अधिकारी ही शामिल नहीं थे। अधिकारियों और व्यापारियों के बीच सौदे तय कराने में एक वकील, निजी कंपनियों से जुड़े कारोबारी और अन्य बिचौलिए सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। ये लोग दोनों पक्षों के बीच संपर्क का काम करते थे और रकम की व्यवस्था कराते थे।

छापेमारी में बेहिसाब संपत्ति बरामद

CBI ने झांसी समेत कई अन्य स्थानों पर की गई छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में नकदी, सोने-चांदी के गहने, संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। जांच एजेंसी को आशंका है कि यह संपत्ति अधिकारियों की ज्ञात आय से कहीं अधिक है और इसे रिश्वत की रकम से अर्जित किया गया है।

दिल्ली और ग्वालियर तक फैली जांच की आंच

इस मामले की जांच अब झांसी तक सीमित नहीं है। CBI को शक है कि रिश्वत की रकम को दिल्ली और ग्वालियर में बेनामी संपत्तियों में निवेश किया गया है। इन शहरों में संपत्ति और बैंक लेन-देन से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं और जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

कर प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल

यह मामला सिर्फ एक अधिकारी के भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे GST सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। ईमानदार व्यापारियों में यह डर पैदा होता है कि कहीं कानूनी कार्रवाई को दबाव और सौदेबाजी का हथियार न बना लिया जाए। यह केस कर प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को एक बार फिर सामने लाता है।

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